200 मेगावाट क्षमता कम करके बचाया जा सकता था तत्तापानी -

    Author: NARESH THAKUR Genre: »
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    200 मेगावाट क्षमता कम करके बचाया जा सकता था तत्तापानी -
      सदियों पुराने आस्था के प्रतीक एवं ऐतिहासिक विश्व विख्यात धार्मिक पर्यटक स्थल तत्तापानी जलमग्न हो गया। गौरतलब है कि उपमंडल करसोग के प्रवेश द्वार पर स्थित मथा समुद्रतल से 630 मीटर की ऊंचाई पर स्थित देश व विदेश में विख्यात प्राचीन तीर्थ स्थल एवं प्राकृतिक गंधकयुक्त गर्म पानी के स्रोतों के लिए प्रसिद्ध तत्तापानी सतलुज नदी के किनारे बसा हुआ है, जहां हर वर्ष लोहड़ी व मकर संक्रांति के पावन अवसर पर हजारों की संख्यां में लोग स्नान कर स्वयं को धन्य समझते हैं। तत्तापानी में पूजा-अर्चना तथा तुला दान धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्त्वपूर्ण माना जाता है। बताते चलें कि कोलडैम परियोजना द्वारा मेले वाला उक्त क्षेत्र अधिगृहीत कर लिया गया है और परियोजना द्वारा जल भराव भी अंतिम चरण में है और प्राकृतिक चश्मों वाला क्षेत्र अब पूरी तरह पानी मे समा चुका है। हालांकि एनटीपीसी ने इस पानी को अपलिफ्ट करके दो चश्में आधुनिक तकनीक से प्राकृतिक चश्मों से दो-तीन किलोमीटर की दूरी पर बनाए गए हैं। बेशक यहां प्राकृतिक माहौल तो नहीं बन पाएगा, लेकिन चश्मों की यह वैकल्पिक व्यवस्था मानी जा रही है। 800 मेगावाट की कौल बांध परियोजना निर्माण के चलते उक्त स्थल उसमें समाहित होने से हमेशा के लिए दफन हो जाएगा। उक्त पर्यटन स्थल को बचाने के लिए प्रशासन तथा सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए। बताया जाता है कि तत्तापानी में महर्षि जमदग्नि और उनके बेटे परशुराम ने इस स्थल पर तपस्या कर इसे एक तीर्थ बनाकर ऊपरी हिमाचल का हरिद्वार बना दिया। मान्यता है कि जो व्यक्ति अपने परिजनों की अस्थियां हरिद्वार में नहीं प्रवाह कर सकता है, वह तत्तापानी में उन्हें प्रवाहित कर सकता है। इसी कारण इसे हरिद्वार का दर्जा भी मिला है। विद्वानों का कहना यह भी है कि महर्षि जमदग्नि ने काफी समय अपनी पत्नी रेणुका के साथ सतलुज के किनारे व्यतीत किया था। जमदग्नि ऋषि अपने आश्रम में नित्य यज्ञ का आयोजन किया करते थे। यज्ञ में आने वाले लोगो को श्रद्धा से भोजन भी करवाते थे। विद्वानों के अनुसार उस समय परशुराम स्नान कर रहे थे। परशुराम की गीली धोती से निकले पानी से यहां पर गंधयुक्त गर्म पानी उत्पन्न हुआ और तभी से यह पर्व आस्था का प्रतीक बना हुआ है, लेकिन उक्त क्षेत्र के जलमग्न होने के साथ तत्तापानी केवल चित्रों में ही सिमट कर रहा गया है। स्थानीय लोगों का कहना यह भी कि तत्तापानी का प्राकृतिक जलस्रोतों वाले क्षेत्र को बचाया जा सकता था, यदि कोल प्रबंधन को केवल 600 मेगावाट उत्पादन के लिए बाधित किया जाता तथा प्रोजेक्ट की 200 मेगावाट क्षमता कम करके उक्त क्षेत्र को बचाया जा सकता था

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