सात चिरंजीवियों में से एक हैं परशुराम

    Author: NARESH THAKUR Genre: »
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    परशुराम भार्गव वंशी महर्षि जमदग्नि के पांच पुत्रों में सबसे छोटे थे। इनकी माता कामली रेणुका इक्ष्वाकु वंशी राजा की पुत्री थीं। इनका नाम ‘राम’ था। शिव से प्रसिद्ध परशु प्राप्त करने के बाद ये परशुराम के नाम से प्रसिद्ध हुए। भार्गव वंश के लोग गुजरात में रहते थे और पश्चिम भारत में राज्य करने वाले हैहयों के कुलगुरु थे। बाद में भार्गवों और हैहयों में शत्रुता हो गई। परशुराम के समय में यह शत्रुता चरम-सीमा पर थी।एक बार परशुराम तपस्या करने के लिए जाते समय अपनी कामधेनु पिता जमदग्नि के आश्रम में छोड़ गए थे। अवसर पाकर हैहय राजा कार्तवीर्य ऋषि को मार कर और आश्रम को जला कर कामधेनु को ले गया। परशुराम के वापस आने पर माता रेणुका ने इक्कीस बार छाती पीट कर अपना दु:ख प्रकट किया तो परशुराम ने क्षत्रियों का नाश करने की प्रतिज्ञा कर डाली। परशुराम ने शस्त्र विद्या द्रोणाचार्य से सीखी थी।
    इससे पूर्व एक बार पत्नी के चित्त की चंचलता से क्रुद्ध जमदग्नि ने जब अपने पुत्रों को रेणुका का सिर काटने के लिए कहा तो परशुराम ने मां का सिर काट डाला। बाद में पिता से मां को जीवित करने का वरदान भी लिया। इसी तरह जब गणेश ने असमय इनको शिवजी के शयनागार में जाने से रोका तो गणेश का दांत ही तोड़ दिया। राम द्वारा शिव-धनुष तोड़ने पर भी इन्होंने अत्यंत क्रोध प्रकट किया था।
    महाभारत तथा पुराणों में इनके 21 बार क्षत्रियों का संहार करने का बड़ा लोमहर्षक वर्णन मिलता है। इनके नरसंहार से बचे हुए केवल 8 क्षत्रियों के नाम उल्लिखित हैं। पर विद्वानों का मत है कि यह पौराणिक वर्णन वास्तव में भार्गव और हैहयों के बीच हुआ आर्थिक और सत्ता संघर्ष था। परशुराम आदि भार्गव समुद्र के पश्चिमी किनारे पर रह कर पश्चिमी देशों से नौकाओं द्वारा व्यापार करते थे और बड़े संपन्न थे। 
    पश्चिमी भारत पर राज्य करने वाले हैहयों ने इस विदेशी व्यापार पर अधिकार करना चाहा। कार्तवीर्य अजरुन ने इस उद्देश्य से सहस्र नौकाएं बना लीं।  इसी से उसका सहस्नजरुन नाम पड़ा। यह व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता ही भार्गवों और हैहयों के युद्ध का कारण बनी। इसमें परशुराम के नेतृत्व में हैहयों की 21 बार पराजय हुई। पुराणकारों ने इसका वर्णन क्षत्रिय संहार के रूप में किया है।
    युद्ध के बाद परशुराम ने हैहय क्षेत्र में नया राज्य स्थापित किया। अंत में सब कुछ ब्राह्मणों को दान देकर वे स्वयं तपस्या करने चले गए। ये विष्णु भगवान के प्रमुख दस अवतारों में कालक्रम से छठे अवतार हैं। इनका अविर्भाव वैशाख शुक्ल तृतीया को प्रदोष काल में हुआ था। राम विवाह के समय अपने गुरु शिवजी के धनुष का भंग सुन कर वे जनकपुरी में आये और श्रीराम का शक्ति परिचय पाकर उन्हें अपना भी धनुष देकर पुन: चले गए।
    असम राज्य की उत्तरी-पूर्वी सीमा में जहां ब्रह्मपुत्र नदी भारत में प्रवेश करती है, वहीं परशुराम कुण्ड है, जहां तप करके उन्होंने शिवजी से परशु प्राप्त किया था। वहीं पर उसे विसजिर्त भी किया। परशुराम जी भी सात चिरंजीवियों में से एक हैं। इनका पाठ करने से दीर्घायु प्राप्त होती है।

    डॉ. रवीन्द्र नागर

    3 Responses so far.

    1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
      घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
      लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
      आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
      सूचनार्थ!

    2. अच्छा लगा.....सातों चिरंजीवियों के बारे में भी जानकारी देने की कृपा करें

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